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वर्ष: 1, अंक 3, 14 सितम्बर, 2016

हिंदी दिवस विशेषांक


कविता


सरस दरबारी


देवदार धधक रहे हैं

 

कोई बुझाओ

बरसों से धधक रही हैं जो

अंचलों में

घुटन बनकर ,

दमन बनकर

शोषण बनकर,

उस आग को बुझाओ।

फैल गई है वह

देवदार के वनों तक,

धधक रहे है जो निरंतर,

फूँक रहे हैं जीव जन्तु,

नेस्तनाबूत कर रहे हैं जंगल

और कुचल रहे हैं ,

नमी की बची खुची आशा ,

यह प्रतिशोध है ,

खुदगरजी के खिलाफ

दोहन के खिलाफ,

सियासत के खिलाफ

जिसे नहीं मतलब

उस आग से

जो जीभ लपलपाती हुई

लील रही है आज

हर उम्मीद को ,

समृद्धि को ,

सबके आँख के पानी को

सभ्यता को ।

अब तो मानव भी उठ खड़ा हुआ है,

प्रतिशोध में ,

मिटा  देने को तत्पर ,

इन खूबसूरत देवदारों को ,

अपनी नाकामी को थोप उनपर ,

वजह खोज रहा है उन्हे छाँटने की ,

वे ज्वलंत हैं , फूँक देंगे सृष्टि ,

कब तक सहते रहेंगे ,

इनकी मनमानी , जला दो ,

काट दो , उजाड़ दो उन्हे ,

मिटा दो नामों निशान।

और मानव ताकतवर है ,

अपना दोष देवदार पर मढ़,

साफ बच निकल सकता है

साफ निकल रहा है

 

-सरस दरबारी

 


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