Sahityasudha view
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
मुखपृष्ठ


साहित्यकारों की रचना स्थली

वर्ष: 1, अंक 3, 14 सितम्बर, 2016

हिंदी दिवस विशेषांक


कविता


संतोष कुमार प्रसाद


घुटन

कब तक डर डर के जीउँगा 
कब तक मारूंगा अपने आप को 
कब तक मरी बाते सूनुंगा 
लोगो की
कब तक तिल तिल जलूँगा 
कभी स्कूल में  पास होने का डर 
कुछ बनने का डर 
कुछ न कर पाने का डर 
माँ बाप के सपनो का डर 
तिल तिल मरते बचपन का डर 
सच कब तक डर के जीउँगा 
कब तक मारूंगा अपने आप को 
दो जून रोटी को , माँ  बाप के सपने को , बच्चों की तमन्नाओ के खातिर 
जलती आँखो को सहता मै 
मरी मछली सी उसकी गंध और कर्कश आवाज़ 
घृणा से उसे देखती मेरी नजर 
होंठ काटते दाँत 
और झूठी मुस्कान के साथ 
झूठी हँसी हँसता मै 
अपनी शारीरिक ताकत को 
वश में करता मै 
पानी से भरी मेरी आँखे 
डर डर के जीने को मजबूर 
एक इंसान ! जी हाँ एक इंसान 
जो आँखे देख डरता है 
डरता किससे है उस आदमी से या अपने आप से , या मजबूरी से 
या उस समाज से या उस प्रथा से 
जिसमे आदमी ने आदमी को गुलाम बनाया 
उसे महिमामंडित किया

-       संतोष कुमार प्रसाद

 


कृपया अपनी प्रतिक्रिया sahityasudha2016@gmail.com पर भेजें
www.000webhost.com