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वर्ष: 1, अंक 3, 14 सितम्बर, 2016

हिंदी दिवस विशेषांक


कविता


संजीव वर्मा सलिल


“ तुलसी

*
तुलसी को 
अपदस्थ कर गयी 
आकर नागफनी। 
सहिष्णुता का 
पौधा सूखा 
घर-घर तनातनी। 
*
सदा सुहागन मुरझाई है 
खुशियाँ दूर हुईं।
सम्बन्धों की नदियाँ सूखीं 
या फिर पूर हुईं। 
आसों-श्वासों में 
आपस में 
बातें नहीं बनी। 
तुलसी को 
अपदस्थ कर गयी 
आकर नागफनी।
*
जुही-चमेली पर 
चंपा ने 
क्या जादू फेरा। 
मगरमस्त संग 
'लिव इन' में 
हैं कैद, कसा घेरा। 
चार दिनों में 
म्यारी टूटी 
लकड़ी रही घुनी। 
तुलसी को 
अपदस्थ कर गयी 
आकर नागफनी।
*
झुके न कोई तो कैसे 
हो तालमेल मुमकिन।
बर्तन रहें खटकते फिर भी 
गा-नाचें ता-धिन। 
तृप्ति चाहते 
प्यासों ने ध्वनि 
कलकल नहीं सुनी। 
तुलसी को 
अपदस्थ कर गयी 
आकर नागफनी।
- संजीव वर्मा सलिल

 


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