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वर्ष: 1, अंक 3, 14 सितम्बर, 2016

हिंदी दिवस विशेषांक


कविता


संजय वर्मा


सूरज

 

सुबह के सूरज से

आँख मिला कर की बातें

दोपहर के सूरज से

नहीं कर सकते बाते

सबने उसे सर चढ़ा रखा

अभिमानी इंसान

दिया भी दिखा नहीं सकते

क्योकि सूरज ने कर रखा

उनकी  परछाई का कद छोटा

 

हर रोज की तरह

होती विदाई सूरज की

सूर्यास्त होता  ये भ्रम

पाले  हुए वर्षो से

पृथ्वी के झूले में

ऋतु चक्र का आनन्द लिए

घूमते जा रहे

सूर्योदय -सूर्यास्त की राह

मृगतृष्णा  में

सूरज तो आज भी सूरज है

जो चला रहा व्रह्माण्ड

सूरज से ही जग जीवित

पंचतत्व अधूरा

अर्थ-महत्व ग्रहण का सब जानते

हे सूरज

धरा के लिए अपनी तपिश को

जरा कम कर लेना

संजय  वर्मा

 


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