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वर्ष: 1, अंक 3, 14 सितम्बर, 2016

हिंदी दिवस विशेषांक


कविता


डॉ०अनिल चड्डा


ख़ुदा तुम्हारा तो ख़ुदा अपना भी तो है यारो,
ख़ुदा के वास्ते, ख़ुदा का नाम न बिगाड़ो यारो !

मज़हबी जुनून जीने के लिये अच्छा नहीं है,
आपसी लड़ाई में ख़ुदा गर्द में न उतारो यारो !

नहीं मालूम कहाँ से आये, कहाँ चले जायेंगें,
कम से कम कोई ज़िंदगी तो सवारो यारो !

अपना घर बसे या उजड़े, ख़ुदा की मर्जी है,
किसी का घर बेवजह तो न उजाड़ो यारो !

सोच अपनी-अपनी, कर्म भी अपने-अपने,
अपनी-अपनी ज़िंदगी चैन से गुजारो यारो


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