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वर्ष: 1, अंक 3, 14 सितम्बर, 2016

हिंदी दिवस विशेषांक


ग़ज़ल


विलास पंडित


ग़ज़ल

 

टूट गया है हर इक रिश्तामंज़र बिखरा बिखरा है 
दुनिया की दरअस्ल हक़ीक़त ये ही सच्ची दुनिया है 

सूरज पर इलज़ाम लगाना मुझको अब मंज़ूर नहीं 
धूप तो शायद सच्ची होगीझूटा मेरा साया है 

दिल को सीने से हटवाकरपत्थर कोई रखवा दो 
मेरा तो हर एक तजुरबा मुझसे इतना कहता है 

मैं तो बैठा देख रहा हूँहालातों के पार मगर 
सोच रहा हूँ कौन है झूटा कौन यहाँ पर सच्चा है 

सच्चाई और अच्छाई तो इक कोने में सिमटी हैं 
तुम जो कुछ ये देख रहे होसब नज़रों का धोका है 

ठुकरा दूँ गर बस में हो तो पल में दुनिया ठुकरा दूँ 
तेरे प्यार की गहराई ने इन क़दमों को रोका  है 

उलझी राहों साथ में उसके करना मत खिलवाड़ कोई 
एक "मुसाफिर"देखने दुनिया आज ही घर से निकला है

 

 

-         विलास पंडित


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