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वर्ष: 1, अंक 3, 14 सितम्बर, 2016

हिंदी दिवस विशेषांक


ग़ज़ल


विलास पंडित


ग़ज़ल

 

 

ये बातों ही बातों में क्या कह गए हम

मुहब्बत में तुमको ख़ुदा कह गए हम

 

जुनूं इस क़दर था मुहब्बत का हावी

तेरी ख़ामोशी को सदा कह गए हम

 

जो लगता था रहज़न, मगर राहबर था

उसे बेवजह ही बुरा कह गए हम

 

ब-यक-वक़्त साए ये तनहाइयों के

मिले तो उन्हें आशना कह गए हम

 

दरख्तों पे लिक्खे कई नाम पढ़कर

बियाबाँ को शहरे-वफ़ा कह गए हम

 

ग़ज़ल ही तो पढ़ता था बस मजलिसों में

मुसाफ़िरको यूँ ही बुरा कह गए हैं

 

-         विलास पंडित


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